पत्रकारिता लोकतंत्र का आईना है और उसकी सबसे बड़ी पूंजी विश्वसनीयता व निष्पक्षता है। लेकिन जब कोई व्यक्ति एक साथ किसी राजनीतिक दल का अधिकृत पदाधिकारी और किसी मीडिया संस्थान का अधिकृत प्रतिनिधि या पत्रकार हो, तो एक बुनियादी सवाल उठना स्वाभाविक है—उसकी प्राथमिक निष्ठा किसके प्रति है—पार्टी के प्रति या पत्रकारिता के प्रति?
राजनीतिक दल का पदाधिकारी स्वाभाविक रूप से अपने संगठन के हितों और विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता है। वहीं पत्रकार का धर्म है कि वह सत्ता से सवाल करे, तथ्यों को सामने रखे और किसी भी पक्ष के दबाव से मुक्त रहे। जब दोनों भूमिकाएं एक ही व्यक्ति में मिल जाती हैं, तो हितों के टकराव की संभावना पैदा होती है।

मुद्दा यह नहीं कि वह व्यक्ति वास्तव में पक्षपाती है या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या उसकी निष्पक्षता पर जनता को संदेह होने की पर्याप्त वजह पैदा नहीं हो जाती?
और यदि वही पत्रकार अपने राजनीतिक दल के पक्ष में खबर करे, विपक्ष पर सवाल उठाए या किसी अधिकारी के खिलाफ समाचार प्रकाशित करे, तो पाठक कैसे तय करेगा कि वह पत्रकारिता कर रहा है या राजनीतिक भूमिका निभा रहा है?
पत्रकारिता में केवल निष्पक्ष होना ही पर्याप्त नहीं है, निष्पक्ष दिखाई देना भी जरूरी है।
इसलिए किसी राजनीतिक दल के अधिकृत पदाधिकारी और सक्रिय पत्रकार की दोहरी भूमिका पर सार्वजनिक बहस होना जरूरी है। बेहतर व्यवस्था यही होगी कि राजनीतिक पद और पत्रकारिता की जिम्मेदारी के बीच स्पष्ट दूरी हो। यदि कोई व्यक्ति दोनों भूमिकाओं में है, तो उसकी राजनीतिक संबद्धता कम से कम पारदर्शी होनी चाहिए।
क्योंकि सवाल किसी एक व्यक्ति का नहीं है।
सवाल पत्रकारिता की साख का है। सवाल जनता के भरोसे का है।
और अंततः सवाल यही है—
जो व्यक्ति किसी राजनीतिक दल का आधिकारिक प्रतिनिधि है, वह उसी समय जनता का निष्पक्ष प्रतिनिधि कैसे हो सकता है?
लोकतंत्र में पत्रकार को किसी दल का प्रवक्ता नहीं, जनता की आंख और कान होना चाहिए।
पत्रकारिता खबर लिखने का अधिकार नहीं, निष्पक्ष रहने की जिम्मेदारी है।