मुंगेली। जिले में एक अधिकारी के तबादले को रुकवाने के लिए पत्रकारों के एक समूह द्वारा प्रदेश के उपमुख्यमंत्री से मुलाकात किए जाने का मामला अब गंभीर सवालों के घेरे में है। सवाल इसलिए भी बड़ा है क्योंकि जिस अधिकारी के तबादले को रुकवाने के लिए पत्रकारों के समूह के DCM से मिलने की बात सामने आई है, उसी अधिकारी पर पत्रकारों के नाम पर जिले के विभिन्न सरकारी कार्यालयों से कथित रूप से राशि वसूलने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इन आरोपों को लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय में शिकायत किए जाने की बात भी सामने आई है।
मामले से जुड़ी अलग-अलग खबरें जिले की मीडिया में प्रकाशित हुई हैं। लल्लूराम डॉट कॉम ने पत्रकारों के एक समूह द्वारा उपमुख्यमंत्री से मुलाकात कर संबंधित अधिकारी के तबादले के संबंध में आग्रह किए जाने की खबर प्रकाशित की है। वहीं ट्रू सोल्जर ने अपनी वेबसाइट पर संबंधित अधिकारी पर पत्रकारों के नाम पर कथित वसूली और भ्रष्टाचार के आरोपों से जुड़ी खबर प्रकाशित की है। इसके अलावा मुंगेली के एक स्थानीय न्यूज पोर्टल ने भी अधिकारी द्वारा कथित वसूली से संबंधित खबर प्रकाशित की है।

एक ही मामले में दो तस्वीरें, सवाल कई
एक तरफ खबर सामने आती है कि पत्रकारों का समूह किसी अधिकारी के तबादले को रुकवाने के लिए प्रदेश के उपमुख्यमंत्री तक पहुंच रहा है।
दूसरी तरफ उसी अधिकारी पर आरोप है कि वह पत्रकारों के नाम का इस्तेमाल कर जिले के विभिन्न कार्यालयों से कथित तौर पर राशि की वसूली करता था।
अगर ये दोनों बातें सार्वजनिक रूप से प्रकाशित खबरों में सामने आ रही हैं, तो सबसे बड़ा सवाल यही है—
आखिर पत्रकारों को किसी अधिकारी के तबादले से इतनी चिंता क्यों है कि वे उसका तबादला रुकवाने के लिए प्रदेश के उपमुख्यमंत्री से मुलाकात करें?
क्या अधिकारी और पत्रकारों के बीच था कोई विशेष समीकरण?
यहां किसी पत्रकार या अधिकारी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा, क्योंकि वसूली और भ्रष्टाचार से जुड़े आरोपों की जांच और सत्यापन संबंधित जांच एजेंसियों द्वारा किया जाना चाहिए।
लेकिन जब किसी अधिकारी पर पत्रकारों के नाम पर सरकारी कार्यालयों से कथित राशि वसूलने के आरोप सार्वजनिक रूप से लगाए जा रहे हों और इस संबंध में मुख्यमंत्री कार्यालय तक शिकायत पहुंचने की बात कही जा रही हो, तब उसी अधिकारी का तबादला रुकवाने के लिए पत्रकारों का सामने आना निश्चित रूप से हितों के टकराव और पत्रकारिता की निष्पक्षता को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।
क्या संबंधित पत्रकारों को इस अधिकारी की कार्यप्रणाली पर भरोसा था?
क्या अधिकारी और इन पत्रकारों के बीच कोई विशेष संबंध या समन्वय था?
क्या संबंधित अधिकारी के पद पर बने रहने से इन पत्रकारों अथवा उनके संस्थानों को कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष लाभ मिल रहा था?
इन सवालों का जवाब संबंधित पत्रकारों को ही देना चाहिए।
सबसे गंभीर सवाल—जनसंपर्क विभाग से जुड़ा अधिकारी
मामला इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि संबंधित अधिकारी के जनसंपर्क विभाग से जुड़े होने की बात सामने आई है।
जनसंपर्क विभाग का काम शासन और मीडिया के बीच संवाद स्थापित करना है। ऐसे में यदि किसी जनसंपर्क अधिकारी के खिलाफ यह आरोप सामने आए कि उसने पत्रकारों के नाम पर विभिन्न सरकारी कार्यालयों से राशि की कथित वसूली की, तो यह केवल एक अधिकारी पर लगा आरोप नहीं रह जाता, बल्कि पूरे मीडिया-प्रशासनिक संबंधों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है।
और जब इसी अधिकारी के तबादले को रोकने के लिए पत्रकारों का समूह राजनीतिक नेतृत्व तक पहुंचता है, तो सवाल और गंभीर हो जाता है।
पत्रकारिता का काम तबादला रुकवाना है या सवाल पूछना?
पत्रकार किसी अधिकारी के अच्छे काम की सराहना कर सकते हैं। यदि कोई अधिकारी जनहित में बेहतर कार्य कर रहा है तो उसकी खबर प्रकाशित करना भी पत्रकारिता का हिस्सा है।
लेकिन किसी अधिकारी का तबादला रुकवाने के लिए राजनीतिक स्तर पर पैरवी करना पत्रकारिता की सामान्य भूमिका से अलग दिखाई देता है।
पत्रकार का काम शासन-प्रशासन से सवाल पूछना है, न कि प्रशासनिक पदस्थापना में किसी खास अधिकारी को बनाए रखने के लिए राजनीतिक दबाव बनाना।
और यदि उस अधिकारी पर भ्रष्टाचार या वसूली के आरोप भी लगे हों, तो यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि आखिर उस अधिकारी के तबादले को रोकने की जरूरत पत्रकारों को क्यों महसूस हुई?
लल्लूराम, ट्रू सोल्जर और स्थानीय मीडिया की खबरों ने बढ़ाए सवाल
इस पूरे मामले में महत्वपूर्ण बात यह है कि घटनाक्रम से जुड़ी अलग-अलग खबरें एक ही प्लेटफॉर्म पर नहीं, बल्कि लल्लूराम डॉट कॉम, ट्रू सोल्जर और मुंगेली के स्थानीय न्यूज पोर्टल पर अलग-अलग माध्यमों से प्रकाशित हुई हैं।
यानी मामला केवल सोशल मीडिया की चर्चा तक सीमित नहीं है। अलग-अलग मीडिया रिपोर्टों में पत्रकारों की DCM से मुलाकात और अधिकारी पर लगाए गए कथित वसूली के आरोपों का उल्लेख सामने आया है।
ऐसे में अब जरूरत है कि संबंधित अधिकारी और पत्रकार समूह खुलकर स्थिति स्पष्ट करें।
क्या अधिकारी पर लगाए गए वसूली के आरोप गलत हैं?
यदि गलत हैं तो शिकायत की जांच क्यों नहीं कराई जाती?
और यदि आरोप निराधार हैं, तो पत्रकारों का समूह उसी अधिकारी का तबादला रुकवाने के लिए उपमुख्यमंत्री के पास क्यों गया?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या पत्रकारिता जनता के सवालों के लिए सत्ता के दरवाजे तक पहुंच रही है, या फिर अपने किसी प्रशासनिक ‘हित’ की रक्षा के लिए?
इन सवालों का जवाब मिलना जरूरी है।
क्योंकि पत्रकारिता की असली ताकत किसी अधिकारी से नजदीकी में नहीं, बल्कि सत्ता और प्रशासन से निष्पक्ष सवाल पूछने में है।
नोट: उपरोक्त खबर में वसूली और भ्रष्टाचार से जुड़े आरोपों को आरोप/शिकायत के रूप में ही प्रस्तुत किया गया है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अथवा न्यायिक निष्कर्ष का दावा नहीं किया जा रहा है।