मुद्दों की नहीं, नेतृत्व की लड़ाई

किसी भी समाज की ताकत केवल उसकी संख्या में नहीं होती। उसकी वास्तविक ताकत इस बात में होती है कि वह अपने सामूहिक सवालों, अधिकारों और समस्याओं को कितनी मजबूती से एक मंच पर रख पाता है।

लेकिन आज हमारे पिछड़े समाज के सामने एक गंभीर विडंबना दिखाई देती है। समाज के पास समस्याएं बहुत हैं, मुद्दे बहुत हैं, संघर्ष के कारण बहुत हैं, लेकिन उन मुद्दों पर एकजुट होकर खड़े होने की क्षमता लगातार कमजोर होती जा रही है।

विडंबना यह है कि यहां लड़ाई अक्सर मुद्दे की नहीं, नेतृत्व की दिखाई देती है।

हर व्यक्ति चाहता है कि समाज उसके नेतृत्व में चले। हर संगठन चाहता है कि उसकी आवाज सबसे बड़ी आवाज बने। हर विंग चाहता है कि समाज उसके कार्यक्रम में आए, उसके आंदोलन को समर्थन मिले और उसके नेतृत्व को स्वीकार किया जाए।

लेकिन सवाल यह है कि जब किसी दूसरे संगठन, दूसरे व्यक्ति या दूसरे समूह द्वारा समाज का कोई महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया जाता है, तब हम उसके साथ कितनी मजबूती से खड़े होते हैं?

अक्सर जवाब निराशाजनक होता है।

सोच यह बन जाती है—
“मुद्दा उसने उठाया है, हम क्यों जाएं?”
“अगर उसके नेतृत्व में आंदोलन सफल हो गया तो?”
“कल इसका श्रेय उसे मिल जाएगा।”
“हमारा संगठन पीछे क्यों रहे?”

और इसी मानसिकता के कारण समाज का एक महत्वपूर्ण मुद्दा धीरे-धीरे किसी एक व्यक्ति या संगठन का निजी मुद्दा बन जाता है।

क्या समाज व्यक्ति से बड़ा नहीं?

यह सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।

यदि किसी व्यक्ति ने समाज की समस्या उठाई है, तो क्या उस समस्या की गंभीरता इसलिए कम हो जाती है क्योंकि उसे उठाने वाला व्यक्ति हमारा पसंदीदा नेता नहीं है?

यदि किसी संगठन ने शिक्षा, रोजगार, सामाजिक सम्मान, भेदभाव, आर्थिक पिछड़ेपन, युवाओं के अवसर या किसी अन्य सामूहिक समस्या को लेकर आवाज उठाई है, तो क्या केवल इसलिए उसका समर्थन नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि आंदोलन का नेतृत्व कोई दूसरा कर रहा है?

यदि जवाब हां है, तो समस्या केवल नेतृत्व की नहीं है। समस्या हमारी सामूहिक सोच की है।

समाज में यह धारणा विकसित होनी चाहिए कि मुद्दा किसी व्यक्ति की संपत्ति नहीं होता।

जिसने मुद्दा उठाया, उसने शुरुआत की।
जिसे मुद्दा सही लगता है, उसे आगे बढ़ाना चाहिए।
और यदि समाज को लगता है कि मुद्दे का समाधान आवश्यक है, तो पूरा समाज उसके पीछे खड़ा होना चाहिए।

यही सामूहिक संघर्ष की बुनियाद है।

हर कोई नेता बनना चाहता है, लेकिन कार्यकर्ता कौन बनेगा?

समाज के भीतर नेतृत्व की आकांक्षा होना गलत नहीं है। नेतृत्व लोकतांत्रिक समाज की आवश्यकता है। समस्या तब पैदा होती है जब नेतृत्व सेवा का माध्यम न रहकर प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाता है।

जब व्यक्ति यह सोचने लगे कि—

“मेरे बिना आंदोलन नहीं होना चाहिए।”

“मेरे नेतृत्व के बिना समाज को आगे नहीं बढ़ना चाहिए।”

“दूसरे व्यक्ति को समाज का नेतृत्व क्यों मिले?”

तब आंदोलन का उद्देश्य पीछे चला जाता है और नेतृत्व स्वयं उद्देश्य बन जाता है।

यहीं से संगठन छोटे-छोटे हिस्सों में बंटने लगते हैं।

एक संगठन का अपना मंच।
दूसरे संगठन का अपना मंच।
एक विंग का अपना कार्यक्रम।
दूसरे विंग का अपना कार्यक्रम।

और अंततः समाज के सामने कई मंच तो दिखाई देते हैं, लेकिन एक साझा दिशा दिखाई नहीं देती।

दूसरे के मुद्दे को अपना मुद्दा मानने की संस्कृति क्यों नहीं बन रही?

किसी भी मजबूत समाज की पहचान यह होती है कि उसके भीतर एक संगठन द्वारा उठाया गया मुद्दा दूसरे संगठन का भी मुद्दा बन जाता है।

लेकिन जब सोच यह हो जाए कि—

“उसने उठाया है, वह ही लड़े।”

तो संघर्ष कमजोर हो जाता है।

आज आवश्यकता इस मानसिकता को बदलने की है।

यदि किसी छात्र के साथ अन्याय हुआ है, तो यह केवल उसके परिवार का मामला नहीं होना चाहिए।

यदि किसी युवा के रोजगार का सवाल है, तो वह केवल उस युवा का व्यक्तिगत सवाल नहीं होना चाहिए।

यदि किसी व्यक्ति के साथ सामाजिक भेदभाव हुआ है, तो उसे केवल उसकी व्यक्तिगत समस्या मानकर छोड़ देना पूरे समाज की कमजोरी है।

यदि किसी समुदाय के अधिकार, सम्मान या अवसर का प्रश्न है, तो उस पर संगठनात्मक झंडे से पहले सामाजिक एकता दिखाई देनी चाहिए।

श्रेय किसे मिलेगा, यह सवाल आंदोलन को कमजोर करता है

सामाजिक आंदोलनों में एक खतरनाक प्रवृत्ति तब पैदा होती है जब लोग यह देखने लगते हैं कि आंदोलन का श्रेय किसे मिलेगा।

यदि आंदोलन सफल हुआ तो कौन नेता कहलाएगा?

किसकी तस्वीर लगेगी?

किसका नाम समाचार में आएगा?

किस संगठन की चर्चा होगी?

यही सोच सामूहिक संघर्ष को व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा में बदल देती है।

लेकिन समाज के किसी मुद्दे का समाधान हो जाए, तो उसका श्रेय किसी एक व्यक्ति को नहीं, पूरे समाज को मिलना चाहिए।

और यदि किसी व्यक्ति ने पहल की है, तो उसके नेतृत्व को स्वीकार करना उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक परिपक्वता हो सकती है।

नेतृत्व बदल सकता है।
संगठन बदल सकते हैं।
व्यक्ति बदल सकते हैं।

लेकिन समाज के मुद्दे स्थायी हो सकते हैं।

इसलिए प्राथमिकता व्यक्ति नहीं, मुद्दा होना चाहिए।

संगठन अनेक हों, संघर्ष एक होना चाहिए

किसी समाज में अनेक संगठन होना अपने आप में समस्या नहीं है।

विचार अलग हो सकते हैं।
कार्यशैली अलग हो सकती है।
नेतृत्व अलग हो सकता है।
संगठनात्मक संरचना अलग हो सकती है।

लेकिन कुछ मूलभूत मुद्दों पर सभी को एक साथ खड़ा होना चाहिए।

इसे ही स्वस्थ सामाजिक लोकतंत्र कहा जा सकता है।

जरूरी नहीं कि हर संगठन हर मुद्दे पर एक जैसा विचार रखे। लेकिन जिस मुद्दे पर व्यापक सामाजिक सहमति हो, वहां व्यक्तिगत मतभेदों को पीछे रखकर सामूहिक हित को प्राथमिकता देना आवश्यक है।

संगठन अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन समाज के हित साझा होने चाहिए।

नेतृत्व का अर्थ सबसे आगे खड़ा होना नहीं

नेतृत्व का वास्तविक अर्थ यह नहीं कि हर मंच पर सबसे आगे कौन खड़ा है।

नेतृत्व का अर्थ यह भी है कि जब कोई दूसरा व्यक्ति समाज का महत्वपूर्ण मुद्दा उठाए, तो हम उसके साथ खड़े होने का साहस रखें।

एक परिपक्व नेता वह नहीं जो हर आंदोलन का चेहरा बनना चाहता है।

परिपक्व नेतृत्व वह है जो सही मुद्दे को पहचानता है, सही व्यक्ति की पहल का सम्मान करता है और आवश्यकता पड़ने पर स्वयं पीछे खड़े होकर भी संघर्ष को मजबूत करता है।

क्योंकि नेता बनने से समाज बड़ा नहीं होता, समाज बड़ा होगा तो नेतृत्व अपने आप बड़ा होगा।

पिछड़ेपन से बाहर निकलने के लिए सोच बदलनी होगी

किसी समाज का पिछड़ापन केवल आर्थिक या शैक्षणिक नहीं होता।

एक समाज संगठनात्मक रूप से भी पिछड़ सकता है।

यदि हम छोटी-छोटी व्यक्तिगत और संगठनात्मक प्रतिस्पर्धाओं में उलझे रहेंगे, तो हमारे सामूहिक प्रश्न पीछे छूटते जाएंगे।

समाज को यह तय करना होगा कि उसे कितने नेता चाहिए, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि उसे कितने सामूहिक मुद्दों पर एकजुट होना है।

हमें यह पूछना होगा—

क्या हम किसी मुद्दे के साथ इसलिए खड़े हैं क्योंकि वह सही है?

या इसलिए क्योंकि उसे हमारा अपना व्यक्ति उठा रहा है?

क्या हम किसी आंदोलन का समर्थन इसलिए करते हैं क्योंकि उससे समाज का हित होगा?

या इसलिए क्योंकि उसका नेतृत्व हमारे समूह के हाथ में है?

इन सवालों के जवाब ही हमारी सामाजिक दिशा तय करेंगे।

अब जरूरत नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा की नहीं, मुद्दों की एकजुटता की है

समाज को ऐसी संस्कृति विकसित करनी होगी जिसमें कहा जाए—

“मुद्दा सही है तो समर्थन मिलेगा, चाहे उसे कोई भी उठाए।”

“संघर्ष समाज के हित में है तो हम साथ खड़े होंगे, चाहे नेतृत्व किसी का भी हो।”

“श्रेय किसे मिलेगा, यह बाद की बात है; पहले समाधान होना चाहिए।”

यही सोच समाज को मजबूत करेगी।

किसी एक व्यक्ति का बड़ा नेता बन जाना समाज की उपलब्धि नहीं है।

समाज की वास्तविक उपलब्धि तब होगी जब उसके मुद्दों पर हजारों लोग एक साथ खड़े हों और किसी भी व्यक्ति, संगठन या विंग से ऊपर सामूहिक हित को रखा जाए।

आज जरूरत इस बात की है कि हम पूछें—

हमारा नेता कौन है? से पहले
हमारा मुद्दा क्या है?

और

इस आंदोलन का श्रेय किसे मिलेगा? से पहले
इस संघर्ष से समाज को क्या मिलेगा?

क्योंकि जब समाज नेतृत्व की लड़ाई से ऊपर उठकर मुद्दों की लड़ाई लड़ना सीख जाएगा, तभी उसकी सामूहिक शक्ति वास्तविक परिवर्तन में बदल सकेगी।

समाज को नेताओं की भीड़ नहीं, साझा मुद्दों पर खड़ा एक मजबूत सामूहिक नेतृत्व चाहिए।

और शायद आज हमारे पिछड़े समाज के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है—
हम एक-दूसरे से आगे निकलने के लिए लड़ेंगे, या अपने सामूहिक पिछड़ेपन से बाहर निकलने के लिए?

Nawabihan
Author: Nawabihan

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