लोरमी।
जब जनप्रतिनिधि विकास के बड़े-बड़े दावे करते हैं और मंचों से ग्रामीण विकास की गाथा सुनाते हैं, तब जमीनी हकीकत कई बार उन दावों की पोल खोल देती है। विडंबना यह है कि जिन जनप्रतिनिधियों को जनता ने अपने अधिकारों और सुविधाओं की रक्षा के लिए चुना, वही सत्ता की छांव में भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरते नजर आते हैं। लोरमी क्षेत्र के ग्राम पंचायत डिंडोरी (चि) का मामला भी कुछ ऐसा ही है, जहां सत्ता के प्रभावशाली गलियारों के बीच बसे गांव के लोग आज भी एक-एक बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं, जबकि सरकारी कागजों में हैंडपंप की मरम्मत पूरी हो चुकी है और राशि भी आहरित कर ली गई है।
यह वही गांव है जिसे केंद्रीय राज्यमंत्री तोखन साहू का गृह ग्राम और उपमुख्यमंत्री अरुण साव के विधानसभा क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। लेकिन विडंबना देखिए कि सत्ता के इस तथाकथित “गढ़” में भी विकास के दावे कागजों तक ही सीमित नजर आ रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि हैंडपंप महीनों से बंद पड़ा है, जिससे मोहल्ले के करीब आधा दर्जन परिवारों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

सरपंच पति की ‘दबंगई’: न खुद सुधारा, न ग्रामीणों को करने दिया प्रयास
ग्रामीण खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ने इस पूरे मामले की लिखित शिकायत जिला कलेक्टर से की है। शिकायत में बताया गया है कि 5 फरवरी 2026 को सरपंच पति ने मरम्मत के नाम पर हैंडपंप का सबमर्सिबल पंप निकलवाया था। इसके बाद सचिव के साथ कथित मिलीभगत कर मरम्मत के नाम पर सरकारी खाते से दो किश्तों में लगभग 70 हजार रुपये निकाल लिए गए—जनवरी में लगभग 40 हजार रुपये और 1 मार्च को 30 हजार रुपये।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि बाजार में नई मोटर महज 7 से 8 हजार रुपये में उपलब्ध है, फिर मरम्मत के नाम पर इतनी बड़ी राशि आखिर कहां खर्च कर दी गई? ग्रामीणों का आरोप है कि जब खेमेश्वर पुरी ने स्वयं अपने खर्च पर मोटर लगवाने या मरम्मत कराने की बात कही, तो उन्हें दबंगई दिखाते हुए गाली-गलौज कर रोक दिया गया और जान से मारने की धमकी तक दी गई।
कलेक्टर का आदेश, लेकिन ‘जांच’ के नाम पर लटका समाधान
मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला कलेक्टर ने जनपद पंचायत के सीईओ को तत्काल निराकरण के निर्देश दिए थे। इसके बाद सीईओ द्वारा एक जांच समिति गठित करने की बात जरूर कही गई, लेकिन यह भी प्रशासनिक औपचारिकता बनकर रह गई। महीनों बीत जाने के बावजूद न जांच पूरी हुई और न ही गांव की पेयजल समस्या का समाधान हो सका।
इस बीच क्षेत्र में वाटर लेवल नीचे जाने के कारण हैंडपंप पूरी तरह बंद पड़ा है और ग्रामीणों की परेशानी लगातार बढ़ती जा रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि स्थानीय प्रभावशाली लोगों के दबाव में प्रशासन भी कार्रवाई करने से बचता नजर आ रहा है।

सत्ता के ‘गढ़’ में सिस्टम फेल
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब प्रदेश और केंद्र के प्रभावशाली नेताओं के अपने क्षेत्र और गृह ग्राम में ही इस तरह की अनियमितताएं और भ्रष्टाचार के आरोप सामने आ रहे हैं, तो दूरदराज के गांवों की स्थिति क्या होगी? क्या प्रशासन उन जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत जुटा पाएगा, जिन पर सरकारी धन के दुरुपयोग का आरोप है?
या फिर यह मामला भी कागजी जांच और राजनीतिक दबाव के बीच दबकर रह जाएगा, जबकि गांव के लोग पानी की एक-एक बूंद के लिए संघर्ष करते रहेंगे।
“हमारा तो बस इतना ही गुनाह है कि हमने पानी मांगा। हमें निर्विरोध चुने जाने की धौंस दी जाती है और डराया-धमकाया जाता है। आखिर हम जाएं तो कहां जाएं?”
— खेमेश्वर पुरी गोस्वामी, पीड़ित ग्रामीण