गंगा जल, घोटाले और गुमान – एक ‘राजनीतिक संत’ की पंचवर्षीय यात्रा!
कभी 15 साल तक सत्ता के वनवास में रहे। तब जनता के दुख-दर्द के हिस्सेदार बनते हुए ऐसा अभिनय किया कि खुद संत, और बाकी सब रावण नजर आए। और जब वनवास खत्म हुआ तो सत्ता का अमृत हाथ लगा — पर अफ़सोस, अमृत की जगह घोटालों का गरल पीते-पीते खुद को ही शिव समझ बैठे।
विपक्ष में रहते जो सीना ठोककर वर्तमान सरकार पर कई घोटाला जैसे मुद्दों पर चिल्लाते थे, सत्ता में आते ही वही आवाज़ सत्ता के गद्दे में दबकर ‘मौन साधना’ में बदल गई। पाँच साल तक सब कुछ देखकर भी न कुछ देखा, न कहा — बस बटोरते रहे, दोनों हाथों से… और शायद पैरों से भी।
इतना ही नहीं, चुनावी मंचों पर गंगा जल हाथ में लेकर शराबबंदी की कसम खाई गई थी — जैसे सत्ता मिलते ही शराब के तालाब सुखा दिए जाएंगे। पर हुआ उल्टा। आरोप हैं कि गंगा जल तो हाथ में था, लेकिन मन पूरी तरह मदिरा माफियाओं की ‘बॉटल पॉलिटिक्स’ में डूबा था। अब तो खुद के ही राज में शराब घोटाले की सुरंगें खुलने लगी हैं — और राजकोष से लेकर नैतिकता तक सबका नशा उतर चुका है।
अब जब सत्ता की चाबी खिसक गई, तो नैतिकता फिर से जेब में लौट आई। मंचों पर वही पुराना तेवर, वही पुराने आरोप — लेकिन इस बार खुद की भूमिका विपक्ष की है, और पूर्व के विपक्षी और वर्तमान सत्ताधीशों की याददाश्त बिल्कुल ताज़ा।
और हाँ, ‘राजा साहब’ का शहजादा अब गिरफ्त में है, अब उसी पर राजकोष से खिलवाड़ के आरोप हैं।
कहते हैं — “जो गंगा जल लेकर राजनीति में आए, वो सत्ता के नाले में बह निकले”।
कभी शराबबंदी का संकल्प था, आज शराब नीति पर सवाल है। कभी घोटालों के खिलाफ सड़कों पर थे, आज उन्हीं के आरोपों में फंसे हैं। समय ने सत्ता की करवट क्या बदली, पूरा कथा-चरित्र ही उजागर हो गया।
व्यंग्यकार की कलम कहती है —
“तपस्वी बन सत्ता में आए, पर भोगी बन निकले,
गंगा जल से शुरू किए थे, पर जाम में ही फिसले।”