1 नवंबर 2000 को जब छत्तीसगढ़ राज्य का गठन हुआ था, तब करोड़ों छत्तीसगढ़ियों की आँखों में एक सपना था — एक ऐसा राज्य जो उनके हक़, अधिकार और पहचान को समर्पित होगा। एक ऐसा भूभाग, जहाँ जल-जंगल-जमीन पर उनके अधिकार को स्वीकृति और संरक्षण मिलेगा। अब जबकि छत्तीसगढ़ अपनी रजत जयंती (25 वर्ष) की ओर बढ़ रहा है, तो यह जश्न के साथ-साथ आत्ममंथन का भी समय है।
1. मूल छत्तीसगढ़ियों की स्थिति: क्या यह राज्य उनका रह गया है?
राज्य बनने के पीछे सबसे बड़ा उद्देश्य था — मूल छत्तीसगढ़ियों को सम्मान, अवसर और नेतृत्व का हक़ देना। लेकिन 25 वर्षों के बाद भी यह प्रश्न बना हुआ है:
क्या मूल छत्तीसगढ़िया राज्य का वास्तविक भागीदार है?
राजनीति में वर्चस्व: सत्ता के गलियारों में मूल छत्तीसगढ़ियों की भागीदारी सीमित हो गई है। बड़ी संख्या में बाहरी राजनीतिक रणनीतिकारों, नेताओं और पैराशूट उम्मीदवारों ने राजनीतिक नेतृत्व पर कब्ज़ा किया है। दलों की प्राथमिकताएँ अक्सर बाहरी समीकरणों पर आधारित होती हैं, न कि छत्तीसगढ़ी हितों पर।
उद्योग और व्यापार: छत्तीसगढ़ खनिज, वन और कृषि से भरपूर राज्य है। लेकिन इन संसाधनों से सबसे अधिक लाभ उठाया है बाहरी पूंजीपतियों और व्यवसायियों ने। रायपुर, भिलाई, बिलासपुर, कोरबा जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में स्थानीय लोगों को केवल श्रमिक बना कर रखा गया है।
मालिकाना हक़ पर बात करें, तो अधिकतर कंपनियाँ, फैक्ट्रियाँ और बड़े कारोबारी प्रतिष्ठान बाहरी लोगों के नियंत्रण में हैं।
बाज़ार का स्वरूप: आज छत्तीसगढ़ के छोटे-बड़े बाज़ारों पर उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, झारखंड, ओडिशा, राजस्थान आदि से आए व्यवसायियों का कब्जा है। स्थानीय व्यापारियों को प्रतिस्पर्धा में पिछाड़ कर बाज़ार से बाहर किया गया या सीमित कर दिया गया।
2. जल-जंगल-जमीन: असली हक़दार बनाम असली शिकार
मूल निवासी – विशेषकर आदिवासी और अनुसूचित जाति समुदाय – सदियों से जल, जंगल और ज़मीन के संरक्षक रहे हैं। लेकिन पिछले 25 वर्षों में:
जमीनों की लूट: सरकारी नीतियों, उद्योगों और भूमाफियाओं के गठजोड़ से लाखों हेक्टेयर भूमि छत्तीसगढ़ियों से छीन ली गई। कभी लीज़ के नाम पर, कभी विकास परियोजनाओं के नाम पर, और कभी भू-अधिग्रहण कानूनों का दुरुपयोग कर।
परिणामस्वरूप, आज छत्तीसगढ़ी किसान या तो मजदूर बन गया है या शहरों की झुग्गियों में दर-बदर की ज़िंदगी जी रहा है।
जंगल की स्थिति: वन अधिकार अधिनियम आने के बावजूद लाखों वनवासियों को आज भी पट्टे नहीं मिले हैं, उल्टा उन्हें अवैध कब्जेदार बता कर उजाड़ा गया। वन संसाधनों से उनका नाता टूटा, और उससे जुड़े आजीविका के साधन खत्म हो गए।
3. षड्यंत्र: कैसे एक रणनीति के तहत छत्तीसगढ़ियों को हाशिए पर डाला गया
यह सामान्य विस्थापन नहीं था, यह सुनियोजित सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक हमला था:
शराब की बाढ़: पिछले वर्षों में सरकार द्वारा शराब नीति को ढीला कर दिया गया। दुकानें गाँव-गाँव में खोल दी गईं, जिससे छत्तीसगढ़ी युवा, किसान और मजदूर वर्ग शराब की गिरफ्त में फंस गया।
इसने केवल स्वास्थ्य को नहीं, समाज, अर्थव्यवस्था और परिवारिक ढांचे को भी तोड़ कर रख दिया।
रोज़गार में भेदभाव: सरकारी और निजी नौकरियों में बाहरी लोगों को प्राथमिकता मिली। स्थानीय युवाओं को रोज़गार के नाम पर ठेके, प्रशिक्षण और वादा तो मिला — पर नौकरी नहीं।
लाखों डिग्रीधारी बेरोज़गार आज भी रोज़गार की तलाश में भटक रहे हैं।
संस्कृति पर हमला: छत्तीसगढ़ी बोली, पहनावा, तीज-त्यौहार, खान-पान सब कुछ धीरे-धीरे ‘आउटडेटेड’ और ‘गंवारू’ बताकर बाहरी संस्कृति को थोपने का प्रयास हुआ।
छत्तीसगढ़ के मूल निवासी अपनी ही ज़मीन पर संकोच से जीने को मजबूर हुए।

4. खेती-किसानी पर हमला: जमीन के बाद अब खेत
अब खेती भी सुरक्षित नहीं। अनेक राज्यों के प्रभावशाली लोग, किसान या कारोबारी के रूप में छत्तीसगढ़ में आकर:
ज़मीनें खरीद रहे हैं
स्थानीय किसानों को लीज़ पर दे रहे हैं
और अंततः उन्हें मजदूर बना रहे हैं
यह नव-साम्राज्यवाद की ऐसी परिभाषा है, जिसमें कृषि, संस्कृति और आत्मसम्मान तीनों पर आघात है।
5. अब क्या करें? – मूल छत्तीसगढ़ियों का पुनर्जागरण आवश्यक है
रजत जयंती केवल उत्सव का समय नहीं है। यह चेतना का समय है।
अब आवश्यकता है:
राजनैतिक एकजुटता की: मूल छत्तीसगढ़ी नेताओं को एकजुट होकर अपने समाज के हितों की आवाज़ बुलंद करनी होगी।
आर्थिक स्वावलंबन की: युवाओं को व्यवसाय, कृषि, तकनीक, और सेवा क्षेत्र में स्वावलंबी बनाना होगा।
संस्कृतिक पुनरुत्थान की: छत्तीसगढ़ी भाषा, रीति-रिवाज़, पहनावा, खान-पान को गर्व से अपनाना होगा।
जल-जंगल-जमीन की वापसी के संघर्ष की: कानूनी, सामाजिक और राजनीतिक मोर्चे पर अधिकारों की पुनः प्राप्ति के लिए आंदोलन ज़रूरी है।
छत्तीसगढ़ की रजत जयंती पर यह सोचना होगा कि यह राज्य किनके लिए बना था और अब किसके हाथों में है?
यह एक आईना है — जिसमें छत्तीसगढ़ के मूल निवासियों को अपना वर्तमान और भविष्य दोनों देखना होगा।
क्योंकि यदि अभी नहीं जागे — तो अगली पीढ़ियाँ हमें माफ़ नहीं करेंगी।