मुंगेली, पथरिया।
छत्तीसगढ़ सरकार की “समाधान शिविर” योजना के तहत जनपद पंचायत पथरिया में सामने आया ₹16.09 लाख का बड़ा वित्तीय घोटाला अब कई नए सवालों को जन्म दे रहा है। 64 ग्राम पंचायतों की जानकारी और स्वीकृति के बिना निजी फर्मों को की गई भारी-भरकम राशि की ट्रांसफर ने पंचायतों की स्वायत्तता और योजनाओं की पारदर्शिता पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।
घोटाले के मुख्य बिंदु:
बिना मांग और आपूर्ति के सामग्री बिल प्रस्तुत कर किया गया भुगतान
सरपंचों व सचिवों के डिजिटल हस्ताक्षर बिना सहमति के उपयोग
श्रीराम बोरवेल्स, गौरव ट्रेडर्स, खुशी कम्प्यूटर सेंटर सहित कई फर्मों को हुआ भुगतान
64 ग्राम पंचायतें – अमलडीहा, करही, रामबोड़, उमरिया आदि हुईं प्रभावित
सभी बिल एक ही टेम्पलेट में – घोटाले की सुनियोजित रणनीति की ओर इशारा
सबसे बड़ा सवाल — किसके कहने पर जमा हुए थे डिजिटल सिग्नेचर?
घोटाले की तह में जाते हुए एक बेहद गंभीर सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर किसके इशारे या आदेश पर महीनों पहले ही सरपंचों और सचिवों के डिजिटल सिग्नेचर जनपद कार्यालय में जमा करवाए गए थे?
> क्या ये कदम पहले से नियोजित योजना का हिस्सा था?
किस अधिकारी ने यह आदेश जारी किया, और किन परिस्थितियों में ऐसा करवाया गया?
यदि बिना वैध प्रक्रिया के जनप्रतिनिधियों के डिजिटल सिग्नेचर जमा कर लिए जाते हैं, तो यह न केवल उनकी भूमिका को निष्क्रिय बनाता है, बल्कि गंभीर साइबर धोखाधड़ी की श्रेणी में भी आता है।
प्रशासन की प्रारंभिक कार्रवाई – केवल संविदा कर्मचारी पर गाज
जनसंपर्क विभाग से जारी खबर के अनुसार, अनिल अमादिया नामक एक संविदा कंप्यूटर ऑपरेटर की सेवा समाप्त कर दी गई है। लेकिन सवाल उठ रहे हैं –
> क्या ₹16 लाख से अधिक की हेराफेरी एक अकेला संविदा कर्मचारी कर सकता है?
जनता बोल रही है कि इस कार्रवाई से प्रशासन केवल पर्दा डाल रहा है और असली “बड़े चेहरे” आज भी सिस्टम के भीतर सुरक्षित बैठे हैं।
कलेक्टर जनदर्शन में हुआ था शिकायत
पार्षद दीपक साहू ने इस मामले को जनदर्शन में उठाया था और इसे “लोकतंत्र का अपमान” बताते हुए कड़ी कार्रवाई की मांग किया था।
जिला पंचायत CEO का बयान
प्रभाकर पांडे, जिला पंचायत CEO ने बताया –
> “एक विशेष जांच टीम गठित की गई थी। जांच के बाद संबंधित व्यक्तियों को नोटिस जारी किए गए हैं। उनके जवाबों के आधार पर आगे विधिसम्मत कार्रवाई की जाएगी।”
समाधान शिविर योजना — उद्देश्य से भटकाव
“समाधान शिविर” योजना नागरिकों की समस्याओं को मौके पर हल करने के उद्देश्य से शुरू की गई थी। ऐसे में बोरवेल और सामग्री आपूर्ति जैसे कार्य इसमें कैसे जुड़े, यह बड़ा प्रश्न बन गया है।
अब जनता पूछ रही है —
क्या दोषियों पर सार्वजनिक रूप से कार्यवाही होगी?
क्या जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएगी?
और सबसे महत्वपूर्ण — क्या डिजिटल सिग्नेचर जमा करवाने वाले “अदृश्य आदेशकर्ता” बेनकाब होंगे?
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