पहाड़ की चोटी पर गूंज रही शिक्षा की घंटी: बचवार में उम्मीद का नया सूरज

बलरामपुर, 01 अगस्त 2025/

छत्तीसगढ़ के जनजातीय और दुर्गम अंचलों में शिक्षा की पहुंच सुनिश्चित करने की दिशा में मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय की युक्तियुक्तकरण नीति आज धरातल पर उम्मीद की कहानी लिख रही है। यह कहानी है बलरामपुर विकासखंड के अत्यंत दुर्गम गांव बचवार की—जहां सड़क नहीं है, परिवहन नहीं है, लेकिन अब हर सुबह शिक्षा की घंटी जरूर बजती है।




जहां शिक्षक बने नायक, और विद्यालय बना चेतना का केंद्र

बचवार गांव, जहां तक पहुंचने के लिए 8-10 किलोमीटर की घने जंगलों और पहाड़ियों से होकर गुजरने वाली पगडंडियों का सफर तय करना पड़ता है। न बिजली, न संचार, न बाजार—लेकिन अब यहां उम्मीद का एक स्कूल है, जो न केवल बच्चों को पढ़ा रहा है, बल्कि पूरे गांव को जोड़ रहा है।

यह परिवर्तन आसान नहीं था। लेकिन जब युक्तियुक्तकरण नीति के तहत यहां शिक्षक पदस्थ किए गए, तब इस बदलाव की नींव पड़ी। सबसे पहले पहुंचे प्रधानपाठक श्री श्याम शाय पैकरा, जिन्होंने एक बैग, कुछ किताबें और ढेर सारा जज्बा साथ लेकर इस गाँव में कदम रखा।

> “मुझे अंदाज़ा नहीं था कि ये जगह मुझे इतना अपनापन देगी,” श्री पैकरा कहते हैं, “लेकिन गांववालों ने मुझे परिवार जैसा अपनाया और बच्चों की आंखों में जो सीखने की ललक देखी, उसी ने मुझे यहीं बसने की प्रेरणा दी।”


जंगल की नीरवता में शिक्षा की आवाज

बचवार में एक और शिक्षक श्री पंकज एक्का वर्षों से सेवा दे रहे हैं। वे याद करते हैं, “जब मैं यहां आया, तब स्कूल एक सामान्य ग्रामीण घर में चलता था। बच्चों के पास बैठने के लिए ज़मीन थी और सीखने के लिए सिर्फ़ लगन। अब वही बच्चे अक्षर जोड़ते हैं, सवाल हल करते हैं और आत्मविश्वास से बोलते हैं।”

बारिश में फिसलन भरी पगडंडियां, गर्मियों में तपता पहाड़, और सर्दियों में सन्नाटा—इन सबके बीच शिक्षक हर दिन पहुंचते हैं, ताकि बच्चों की पढ़ाई न रुके।




विद्यालय नहीं, एक आंदोलन है बचवार का स्कूल

बचवार का विद्यालय अब महज़ एक शैक्षणिक संस्था नहीं, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन बन चुका है। ग्रामीण श्री लखन राम कहते हैं, “पहले कोई सोच नहीं सकता था कि यहां शिक्षक टिकेंगे। लेकिन अब ‘मास्टर साहब’ यहीं रहते हैं। हमारे बच्चे स्कूल जाते हैं, पढ़ाई की बातें करते हैं। पहले जो जंगल और पशु चराने जाते थे, अब वे किताबें खोलते हैं।”

इस प्रेरणा से गांव वालों ने भी जबरदस्त भागीदारी दिखाई। जब प्रशासन ने स्कूल भवन की मंजूरी दी, तो ग्रामीणों ने टिन की चादरें, सीमेंट की बोरियां और लोहे के एंगल खुद अपने कंधों पर लादकर 10 किलोमीटर की कठिन चढ़ाई पार कर विद्यालय स्थल तक पहुंचाया।


युक्तियुक्तकरण: योजना नहीं, सच्चा सामाजिक न्याय

मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय की पहल पर शुरू की गई युक्तियुक्तकरण नीति ने केवल संसाधनों का बेहतर उपयोग ही नहीं किया, बल्कि शिक्षा को उन स्थानों तक पहुंचाया है जहां सरकारें पहले हिचकती थीं।

बचवार में यह योजना केवल आंकड़ों की उपलब्धि नहीं, बल्कि एक जीती-जागती सामाजिक क्रांति है। यहां शिक्षक, शिक्षा और समाज ने मिलकर दिखा दिया कि सीमाएं भौगोलिक हो सकती हैं, मन की नहीं।


निष्कर्ष: शिक्षा की सच्ची कहानी, पहाड़ों की गोद से

बचवार का स्कूल यह साबित करता है कि जब सरकार की नीति, शिक्षक का समर्पण और समाज की साझेदारी एक साथ आते हैं, तब सबसे सुदूर और उपेक्षित क्षेत्र भी शिक्षा से रोशन हो सकते हैं। यह कहानी केवल बचवार की नहीं, बल्कि उन हजारों गांवों की प्रेरणा है जो आज भी शिक्षा के इंतजार में हैं

Nawabihan
Author: Nawabihan

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