व्यंग्यात्मक विशेष रिपोर्ट:
मुंगेली, 04 अगस्त 2025 — देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस, जिसने कभी स्वतंत्रता आंदोलन की अगुवाई की थी, अब शायद विचारों की जगह विरोधी दल की नकल को ही सफलता की सीढ़ी मान बैठी है। “मंडल अध्यक्ष बनाने की परंपरा भाजपा में है” — यह सब जानते हैं, लेकिन अब कांग्रेस भी उसी ढर्रे पर संगठन गढ़ने निकल पड़ी है।
मुंगेली जिले में बीते दिनों हुए दो अलग-अलग कांग्रेस बैठकों में “मंडल अध्यक्ष” चुने गए। कहीं रानू कश्यप को मंडल अध्यक्ष बनाया गया, तो कहीं खैरा सेतगंगा में मंडल व सेक्टर स्तरीय नामों की सूची गिनाई गई। अब सवाल यह उठता है कि क्या कांग्रेस अब अपनी वैचारिक धारा भूल रही है? या फिर भाजपा के पदनामों को ही संगठन विस्तार का मंत्र मान चुकी है?
जहाँ भाजपा का संगठन वर्षों से प्रांत प्रमुख से लेकर मंडल अध्यक्ष और संपर्क प्रमुख तक विस्तार से चलता है, वहीं कांग्रेस, जो हमेशा से ब्लॉक, जिला, प्रदेश अध्यक्षीय संरचना की बात करती थी, अब मंडल-संरचना की छांव में खड़ी दिख रही है। ऐसा लगता है जैसे कांग्रेस ने ‘संगठन सृजन कार्यक्रम’ को ‘संगठन अनुकरण कार्यक्रम’ में बदल डाला हो।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज और जिलाध्यक्ष घनश्याम वर्मा की अगुवाई में हो रहे इन आयोजनों में संगठनात्मक मजबूती की बात तो होती है, लेकिन असली सवाल यही है कि क्या कांग्रेस अब भाजपा के मॉडल से संगठन चलाकर जनाधार हासिल करना चाहती है?
प्रभारी जागेश्वरी वर्मा के नेतृत्व में जब खैरा सेतगंगा की बैठक में मंडल और सेक्टर कमेटियों के नाम घोषित हुए, तो कुछ पुराने कांग्रेसी कार्यकर्ता कान खुजाते नज़र आए — “अरे! ये तो भाजपा वाला ढांचा है ना?”
क्या यह कांग्रेस की रणनीतिक चाल है या विचारधारात्मक भ्रम का परिणाम — ये तो आने वाला समय बताएगा। लेकिन फिलहाल कांग्रेस का यह बदला हुआ ‘संघटनिक चेहरा’ यही संकेत दे रहा है कि वह अब न केवल भाजपा से चुनाव जीतना चाहती है, बल्कि भाजपा की तरह दिख कर ही जीतना चाहती है।

